देश नही बनता चिंगारी से , गरिमा यादव

गरिमा यादव लखनऊ से संबंध रखती हैं और शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ कविताएं शायरी लिखने का शौक रखती हैं।

गरिमा यादव के द्वारा लिखी हुई यह कविता है जिसमें देश किन चीजों से बनता है किन भावों से बनता है इस बात का जिक्र किया गया है।
देश नहीं बनता चिंगारी से,
देश नहीं बनता अपराधी से,
देश नहीं बनता चोरी से,
देश नहीं बनता गद्दारी से,
देश नहीं बनता ज़ज़्बातों से
देश नहीं बनता टूटे पैरों से
देश नहीं बनता कटी जुबान से
देश नहीं बनता हाथों की लकीरों से,
देश नहीं बनता टूटे सपनो से,
देश नहीं बनता संविधान की बंज़र नीव से,
देश बनता है -एकता से
जो आपमें और मुझमें कहीं नहीं!
देश बनता है -देखे गए भविष्य के सपनों से,
जो आप और मैं कभी देखते ही नहीं!
देश बनता है -संविधान से जो कभी मिटे नही
जिसे आपने और मैन बंजर कर दिया!
देश बनता है -ईमानदारी से
जो आपमे और मुझमे बची ही नही..!!
देश बनता है -रिश्तो से
जिसे निभाने की चाहत आपमे और मुझमे नहीं!
देश बनता है -मजबूत पैरों से,
जो लोहे के समान खड़े रहे,
कितने भी पत्थर उस पर वो टूटे नहीं!
देश बनता है -ईमान से
जो आपमें और मुझमे मर चुका है!
देश बनता है -मुट्ठी से
जिसे हम साथ रहकर बांधते हैं
जहां अब आपने और मैंने काँटे ऊगा लिए हैं।
हमारे पास जो भी कविताएं आती हैं उसमें किसी भी प्रकार की कोई एडिटिंग नहीं की जाती है क्योंकि लिखने वाला किस भाव से उसे लिख रहा है इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है अतः कविता के भावों पर ध्यान दें।
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