तुम हार मानकर बैठे हो – मयंक दिवाकर बाबा

संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में तमाम शक्तियों को लेकर धरती पर जन्म लेता है लेकिन खुद पर विश्वास ना होने के कारण उसे किसी ना किसी चीज का अफसोस बना रहता है। लेकिन अगर खुद पर विश्वास किया जाए तो संसार के समर को जीता जा सकता है । इसी बात को एक परिवर्तन फाउंडेशन के पदाधिकारी मयंक दिवाकर बाबा अपनी पंक्तियों में पिरो कर बताते हैं । पेश है मयंक दिवाकर के द्वारा लिखी गई कविता विश्वास
“विश्वास”
तुम हार मानकर बैठे हो,
दुनियावी झंझाबातों से l
दुनिया के गम कम ना होंगे,
हाले दिल के जज्बातों से l
संसार समर को जीतेंगे,
मजबूती भरे इरादों से l
दो हाथ हमारे हाथों में,
विश्वास भरे अरमानों से l
तुम दुर्गा हो, तुम काली हो,
तो क्यों सहती सबकी गाली को l
तुम हो इस दुनिया की जननी,
तुम पर टिका इस सांसर का भार l
उठो और जानों अपने अधिकार,
नहीं हो तुम किसी से अंजान l
मत थमों और मत डरो किसी से,
उठकर दिखा दो अपने मजबूत इरादों को l
दो हाथ हमारे हाथों में,
विश्वास भरे अरमानों से l
तुम हार मानकर बैठे हो,
दुनियावी झंझाबातों से l

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